जैसा शब्द वैसी ही उसकी गहराई, आज उम्मीद से क्या नहीं जुड़ा हैं, हर रिश्ते – नाते, पढाई -लिखाई, सफलता-असफलता, जीना- मरना, और ना जाने कितने वाक्ये जुड़े हैं इस उम्मीद शब्द से, उम्र के पढाव मे आने के बाद सावित्री के जीवन में इस कदर खाली पन आ गया कि घंटे तो छोड़ो एक एक पल का गुजरना भी भारी पढ़ने लगा था, आज उसे पछतावा हो रहा था अपने ही किये फैसले पर, घर परिवार की खुशी के कारण सावित्री ने अपने प्यार अमर से भी मुँह मोड़ लिया। बहुत प्रेम था दोनों को एक दूसरे से, ऐसा प्रेम जिसमें ना कोई बंधन महसूस करता था ना कोई घुटन, बहुत ही निश्छल प्रेम था, तभी तो सावित्री के मना करने पर अमर ने तुरंत हामी भर दी, क्योंकि अमर को सावित्री पर भरोसा जो था कि आज उसके परिवार को उसकी जरूरत थी,, अमर का साथ नहीं सही परिवार का साथ तो रहेगा यही सोच सावित्री अपने परिवार वालो जिसमें माँ बाप बहन और भाई की जिम्मेदारी उठाने लगी, समय का पहिया ऐसा घुमा की पता ही नहीं चला कि उसके भाई बहन कब जवान हो गए। सबकी उम्मीदों मे खरा उतरते उतरते, अपनी उम्मीदों पर तो ताला लगा चुकी थी सावित्री, उम्र की झाइन्या भी अब चेहरे पर इतराने लगी थी, कहाँ फुर्सत थी सावित्री को अपने आपको झाँकने की, इसलिए समय से पहले उम्र ने ही दस्तक दे दी, कभी आईना के सामने खड़े भी हो जाती तो आईना भी इठलाते हुए उसे चिढ़ा रहे मानो, ऐसा महसूस होने लगा था उसे, दोनों भाई बहन कि शादी का समय आ गया ।
उसकी बहन मधु मध्यम एवं शिक्षित परिवार की बहू तो बन जाती हैं लेकिन अपनी बहन सावित्री को ताने मारना नहीं छोड़ती, वही भाई भी शादी के बाद अपने बीवी में मस्त हो गया, माँ बाप भी गुजर गये, रह गयी सावित्री अकेले, शादी होते ही भाई अलग मकान लेकर रहने लग। अब सावित्री के जीवन में रह गया कोई तो वह है खालीपन, सावित्री क्या कर रही ना भाई को मतलब था ना बहन को,कब अतीत के दरिया में डूबते डूबते नींद के गोते लगा लेती थी सावित्री, वरना नींद जो जैसे आँखो को छुकर चली जाया करती थी, धीरे धीरे सावित्री बीमार पढ़ने लगी, आस पड़ोस के लोग हाल चाल पूछ लिया करते थे, कई बार भाई बहन के पास संदेश भेजा परंतु किसी ने सावित्री की सुध ना ली, मजबूर हो जाती सावित्री सोचने में, क्या मेरे त्याग का यही फल मिला, मैंने अपने प्यार का त्याग किया, ताकि मेरे भाई बहन की परवरिश मे कोई दिक्कत ना हो, हर रिश्ते कि डोर एक उम्मीद से बंधी होती हैं, परंतु यहाँ मुझे वो भी नसीब ना हुआ, सोचते सोचते कब सुबह हो गयी। जीवन का खालीपन एक बार फिर उसका मन अमर की ओर झुकने को आतुर होते नजर आया,ये अजीब सी कसक मन मे अमर को लेकर क्यों उठती हैं।
पता नहीं मन क्या चाहता हैं,जबकि फैसला मैंने सुनाया था, मन होता हैं चली जाऊ क्या एक बार फिर से उसके आगोश मे, जाकर समा लू खुद को और भूल जाऊ सब कुछ, फ़िर मेरे अंदर से ही आवाज़ आती है, नहीं रूको कहीं वो शादीशुदा जीवन तो नही बिता रहा होगा, क्यों उसके जीवन की गृहस्थी खराब करू, परंतु मन का एक स्वार्थी कोना कहता, नहीं आज भी अमर मुझसे उतना ही प्रेम करते होंगे जितना पहले। अमर अपने जीवन मे व्यस्त ही सही पर एक उम्मीद अभी भी बाकी हैं कि आज भी वह कहीं मेरा इंतजार तो नही कर रहा होगा। दूर से दूसरे की झलक भी कई बार अमर के होने का अहसास करा जाते हैं, कैसे मिलूँ, कहाँ ढुंढ के लाऊ मन बड़ा बेचैन सा हो जाता हैं, साँस आखिरी हो और अमर से ना मिल पायी तो! ये डर उसे पूरी तरह बेचैन कर गया और उसके पैर अपने आप उठ गए अमर की तलाश में, चलते चलते कब लडखडा गयी, और जब होश आया तो एक हाथ उसके हाथ को थामे हुए था,झटके के साथ उसकी तंद्रा टूटी तो पाया, आँखो में प्यार लिए बड़ी ही मजबूती से हाथ थामने वाला और कोई नहीं ,अमर था । आज तो कुछ अलग ही सुबह थी सावित्री के जीवन मे,क्यूकि आज उसकी उम्मीद जो पूरी हो गयी, पा लिया अमर का साथ एक बार फिर से, और सावित्री की बुढी आँखें उसको निहारते रही, जब तक अमर ने उसे बाँहो मे नही भर लिया। आज मानो धरती और स्वर्ग का मिलन जैसे अहसास था दोनों के मन में, इंसान जब तक जिंदा रहता हैं उसकी उम्मीद तब तक बनी रहती हैं।