फैसला

कभी  कभी हम जीवन के उस राह मे आकर खुद को खड़ा पाते है, जहां पर अपने ही लिए फैसले मे कुछ समय के लिए पछताना पड़ जाता है।  ऐसा ही कुछ वाक्या हुआ शोभा के साथ, जब वह कॉलेज के आखिरी साल की तैयारी मे लगी हुई थी, आँखों मे अनगिनत सपना संजोये हुए, सबके लिए आदर्श बनने की चाह और कुछ अलग कर गुजरने की जिद लिए अपनी मंजिल को अग्रसर हो ही रही थी ,कि अचानक एक दिन उसके पापा को दिल का दौरा पढ़ता है और वे स्वर्ग सिधार लेते हैं, समय के इस चक्र को कौन जानता था तीन बहनों में बड़ी शोभा को एक दिन समय के हाथों अपना सपना चकनाचूर होते देखना पड़ेगा।  मां और दो बहनो की जिम्मेदारी अब शोभा के कंधे पर आ गयी, माँ गृहिणी थी, पापा बैंक मैनेजर और तीन बहनों का सुखी संसार था।  शोभा अपने सपनों को लेकर काफी खुश थी, परंतु उसके पापा का गुजरना उसके जीवन मे भूचाल ला दिया था, जैसे तैसे खुद को शोभा ने संभाला और जिम्मेदारी उठाने को खुद को तैयार किया और बढ़ गयी उस राह में जहां उबड खाबड रास्तों मे खुद को संभालते हुए, परिवार को संभाल लिया।  समय बीतता गया, कब दोनों बहने इंजिनियरिंग की पढ़ाई भी पूरी कर ली, और उनकी पसन्द के अनुरूप दोनों का ब्याह भी करवा दिया , और उनके जीवन को नयी राह दे दी। परंतु इन सब जिम्मेदारियों ने शोभा के अंदर के स्त्रित्व को लगभग धूमिल कर दिया था, वह भूल चुकी थी वो भी एक औरत हैं, उसकी भी अपनी गृहस्थी होनी चाहिये, उसके अंदर भी भावना हैं।  तभी तकदीर ने शोभा के लिए कुछ सोच रखा था, जिस कॉलेज मे वह पढ़ाती थी, उसी कॉलेज मे सुमित नाम का नया प्रोफेसर आया, नैन नक्ष भी ठीक ठाक ही थे, कॉलेज के पहले दिन से ही शोभा जैसे सुमित को भा सी गयी थी, चूँकि शोभा सुमित से पूरे दो साल उम्र मे बड़ी थी फिर भी ना जाने उसका शांत स्वभाव, उसकी शालीनता उसे शोभा की तरफ आकर्षित होने से रोक पाने मे असमर्थ थे।  इन सब बातों से शोभा अंजान नहीं थी परंतु शोभा को समझ नहीं आ रहा था 40 वर्ष की आयु में वो अपने जीवन की नई शुरुवात कैसे करे, उम्र में छोटे सुमित के साथ कहीं ये धोखा तो नहीं होगा यही सोचते समय आगे बढ़ने लगा, परंतु समय के साथ साथ सुमीत का झुकाव भी बढ़ने लगा, शोभा को ये बात खटकने लगी, फिर भी सुमीत ने हार नहीं मानी।  आखिरकार एक दिन सुमीत शोभा की माँ से मिलने उसके घर पहुँच ही जाता हैं और अपनी मन की बात कह डालता है, कि शोभा ही मेरी जीवनसंगिनी बनेगी माँ जी यदि आप चाहेंगी तो सब हो जायेगा,शोभा का हाथ मेरे हाथ मे दे दीजिये मां जी, इतने आग्रह और शालीनता से बात रखी सुमीत ने की वो मना नहीं कर पायी, शोभा से बात करने का दिलासा देकर उसे रवाना करती हैं ।  जिस प्रकार सुमीत भी एक लड़की से धोखा खाने के बाद अकेले जीवन जीने का फैसला कर चुका था, परंतु शोभा को देखकर उसे उसके साथ जीने की एक नई आशा नजर आयी। आखिरकार कुछ समय के इंतजार के बाद सुमीत को वो खुशी मिल ही गयी जिसका उसे इंतजार था, शोभा उसकी जीवनसंगिनी बननें को राजी हो गयी। आज पूरी जिम्मेदारी निभाने के बाद उसने पहली बार अपने लिए जिम्मेदारी निभाई शोभा और सुमीत का घर बस गया , माँ भी शोभा के साथ ही रहने लगी थी।  सब कुछ ठीक चल ही रहा था कि एकाएक एक दिन शोभा की छोटी बहन बिंदु अपने ससुराल वालो से झगड़ कर शोभा के यहाँ आ पहुँची और बिलख बिलख कर रोने लगी, कि ससुराल बहुत ताना मारते हैं और पति दिनभर शराब मे मस्त रहता हैं मेरी वहां किसी को कोई परवाह नही, पति भी मारपीट करने लगा हैं, ऐसा कहकर फूट फूट रोने लगी, मैं उस घर में नहीं जाऊंगी। ये सब शोभा की मां सब सुन रही थी, परंतु वह बहुत चिंतित होने लगी कि एक बेटी का घर टूटने की नौबत के साथ साथ, शोभा के नये बसे घर में कोई दिक्कत ना आ जाये, ये सोच वह ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।  फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था जीवन के खालीपन बिंदु को काटने लगा वह धीरे धीरे सुमीत की ओर आकर्षित होने लगी। जब जब वह सुमीत और शोभा को देखती उसे  ईर्ष्या होने लगी, यह  ईर्ष्या उसे सुमीत की ओर और धकलने लगी। यह झुकाव उसकी माँ के नजर से छुप ना सका, एक दिन उसने बिंदु से इस विषय मे बात करने की ठानी और अप्रत्यक्ष रूप से उसे अपने ससुराल जाने की बात कह डाली, ये सुनकर बिंदु दहाड़ मारकर रोने लगी, कि मेरा यहां कोई नही क्या मैं यहाँ रह नहीं सकती, पापा होते तो ये दिन देखना ना पड़ता, ऐसा कहकर पूरा घर सिर पर उठा लिया।  तभी सुमीत और शोभा घर पहुँचते हैं, और दोनों इस माजरे से अंजान, फिर भी बात संभालते हुए शोभा बिन्दु को ढाढस बंधाया, और कहा कि ये तुम्हारा भी घर हैं यहाँ जब चाहे आ सकती हो और जब चाहे रुक सकती हो।  कुछ दिन तो सब ठीक था परंतु बिंदु का झुकाव सुमीत की ओर बढ़ ही रहा था, सुमीत भी कब तक अंजान रह पाता, कभी कभी वो भी बिंदु को देखते ही रह जाता फिर नजरे फेर लेता ! इधर शोभा की माँ को समझ नहीं आ रहा था की क्या करे, क्योंकि बिंदु की नासमझी कहीं शोभा का घर ना उजाड़ दे, क्योंकि सारे सपनों की तिलांजलि देने के बाद उसके जीवन में कुछ सुख के क्षण आये थे, वह उसे ऐसे बिखरने नहीं देना चाहती थी।  परंतु कुछ चीजें अपने बस में नहीं होती, सुमीत का भी पैर फिसलने लगा, धीरे धीरे बिन्दु की ओर आकर्षित होने लगा, और इस बात की भनक शोभा को भी लग गई। कुछ पल के लिए उसके सपनों का संसार धराशायी होते नजर आता हैं, वह बिस्तर पर पड़े पड़े बेसुध सी , बिखरे बाल, अविरल आँसू के धारा जो रोके रुक नहीं रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो एक एक उसके जीवन का पन्ना बिखर रहा हो, और उस पर हँस रहा हो।  आज सुमीत के साथ घर बसाने का फैसला मानो उस पर उलट कर उसका मजाक बना रहा हो, क्यूँ किया उसने शादी क्यूँ हामी भरी थी उसने! क्यों उसके आँखों ने अधूरे सपने देखें जो कभी पूरे होने ही न थे। उसने बिना किसी से कुछ कहे शहर छोड़ने का फैसला ले लिया था, उधर सुमीत भी अपने आपमें पछता रहा था, कि आखिर उसने इतनी बड़ी गलती कैसे की, कैसे उसने शोभा की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया, क्यों वह बिन्दु की तरफ आकर्षित हो गया था, सुमीत भी अपनी गलती सुधारने का फैसला करता हैं, और इधर शोभा भी नये फैसले के साथ खुद को तैयार कर सुमीत से तलाक लेने का सोचकर शहर से बाहर जाने का मन बना लेती हैं।  इस दौरान शोभा की माँ अपनी दूसरी नंबर की बेटी हेमा को सब वारदात बता कर उसे बुला लेती हैं, हेमा बिन्दु के ससुराल वालों से बात कर बिन्दु को ससुराल वापिस ले जाने की बात कहकर लेने आने को राजी कर लेती हैं। बिन्दु को भी अपनी गलती का अहसास होता है और ससुराल लौट जाती हैं, इधर सुमीत शोभा से माफी दी हैं और भविष्य में ऐसी गलती ना दोहराने का वादा करता हैं , और साथ ही हमेशा शोभा की जिंदगी में बने रहने का वचन भी देता हैं। इधर माँ और हेमा शोभा को खूब समझाते हैं कि एक मौका सबको मिलना चाहिए, एक बुरा स्वप्न समझ कर भूल जाने की बात कहते हैं, कुछ पल सोचने के बाद शोभा फिर से सुमीत के साथ हँसी खुशी जीने को राजी हो जाती हैं  अपने सपनों के साथ।

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